कविता

आँखों की नज़ाकत

शुभम श्रीवास्तव

जनवरी ८, २०१९

इस कविता में कवि ने एक प्रेमी के दृष्टिकोण से अपनी प्रेमिका की आँखों की तारीफ़ करते हुए अपने दिल के जज़्बातों को बयाँ किया है | प्यार के एक सुंदर वाक्य को मधुर और आकर्षक शब्दों के सार्थक बंधन में बाँध कर उसको कविता का स्वरूप दिया है | आँखें न सिर्फ़ इंसान को प्रभावशाली बनाती हैं, बल्कि अपने आप में बहुत सारे मनोभाव तथा विचारों को भी व्यक्त करती हैं, कुछ ऐसे भाव भी जिन्हें ज़ुबां से बयाँ करने में हम अक्सर हिचकिचाते हैं | साथ ही चंचलता और शरारत की जहाँ बात की जाए, और आँखों का ज़िक्र न हो, यह तो हिंदी काव्य में मानो असम्भव-सा लगता है | तो उन्ही आँखों की शरारतों और उनके असर के बारे में कुछ पंक्तियाँ शुभम की कलम से |

ना दिखा इस क़दर इन आँखों की नज़ाकत,
देख इन्हे दिल और भी बेताब होता है |
इतना नशा इन नैनों में समाए रखती हो,
मन पीने को उतावला ये शराब होता है |

नज़रें संगमरमरी सुरूर चढ़ा जाती हैं,
कसम खुदाया जिस्म ये आब-ए-शबाब लगता है |
मौसम का मिजाज़ देख तुझको यूं बदला,
जंगल भी अब बाग़-ए-ग़ुलाब लगता है |

हिजाब में कैद तेरी सुरमयी निगाहें,
कत्ले आम मचा दें, एक झलक से जो चाहें,
हम भी मरीज़-ए-इश्क़ हुए इस हद तक,
तेरे हाथों से थप्पड़ भी करारा क़बाब लगता है |

ज़ालिम है तू, बेरहम, बेहया, बेदर्द है,
बरबख़्त दिल को तुझ बिन सब बेस्वाद लगता है,
मिटते हैं कितने कातिलाना वार से नज़रों के तेरी,
फँस के इस जाल में आशिक़ बर्बाद होता है |

ना दिखा इस क़दर इन आँखों की नज़ाकत,
देख इन्हे दिल और भी बेताब होता है |

Shubham Srivastava

Shubham Srivastava

Shubham is not a reader but has inherited his love for poetry from his mother. He’s never stepped into a bookstore, but one can’t guess it through his writing. He deeply believes in love and has the ability to transform his feelings and emotions into melodious rhymes and beautiful illustrations.

He works as a graphic designer at The Curious Reader.